कहीं महिलाओं का सशक्तीकरण, किसी केअधिकार के दुरूयोग पर तो नहीं।

महिला सशक्तिकरण, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, महिलाओं का सम्मान, इत्यादि हमारे समाज के मुख्य कार्यकारी हिस्से है। और होना भी चाहिए एक महिला एक जन्नी है, हमारे समाज का अभिमान है और हम सभी के घरों का गौरव है।
आज समाज के हर वर्ग में हम तैयारियां कर रहे है, महिलाओ को सम्मानित करने के लिए और क्यूं ना हो, दोस्तो महिला दिवस जो आ रहा था ।
आप बोलेंगे अभी आप सम्मान की बाते कर रही है, अपने लिख दिया ” महिलाओं का सम्मान किसी की कब्र पर तो नहीं” । दोस्तो सही पढ़ा, महिलाओ के हक के लिए देश के राजाओं तक ने कई लड़ाइयां लड़ी।
भारत के इतिहास में वैदिक काल में तो महिलाओं और पुरुषों को सम्मान अधिकार प्राप्त थे। महिलाएं घर संभालने के साथ साथ, सेनाएं, गुप्तचर, वीरांगना, वाणिज्य इत्यादि कार्य पुरुष के साथ ही किया करती थी। महाभारत काल हो या पुराणों में व्याख्य न हो, महिलाए हमेशा बराबर के दर्जे पर रही है। मुगलों ने हमारे इतिहास से छेड़छाड़ की और युद्ध में विजय के बाद उनको वैश्य वृती में डालने लगे। और यही था महिलाओ के अधिकारियों का पतन।
परन्तु आज हम इक्कीसवीं सदी में आ चुके है, अधिकारियों का मतलब समझते है। सरकार की मदद से, सामाजिक कार्यकर्ता की वजह से, अपने देश के कानून की वजह से एक बार फिर महिलाएं आज फिर पुरुषों से कंधा मिलाकर चल रही। और देश के बड़े बड़े पदों पर आसीन भी है। वो आज घर संभाले के साथ साथ देश को संभालने में बराबर की हिस्सेदारी है। और ये सब हम महिलाओ को अधिकार के रूप में मिले है।  अधिकार हमारे हथियार है उपकरण है। हमे इन्हे कैसे इस्तेमाल करना है, हमारे ऊपर है।
मतलब क्या ऐसा भी हो सकता है कि महिलाएं भी इन अधिकारों का दुरूयोग करे। अधिकार का दुरूयोग हमारे यहां होते ही है, जिसके साथ पैसा हैं, राजनीति है, पुलिस है, बड़े बड़े वकील है, वहां हमारे देश के अधिकार लोगो की जेबों में पड़े मिलते है। और हर नुक्कड़ पर बिकने को तैयार रहते है।
ऐसे ही कुछ अधिकारों के दुरूयोग में महिलाएं भी पुरुषों से कम नहीं। महिलओं की रक्षा के लिए कानून बने और कुछ महिलाएं इन अधिकारों को अपना हथियार बनाकर निकाल पड़ी है, बदला लेने। कुछ पढ़ी लिखी महिलाए कानून का दुरूयोग करने में पीछे नहीं।
जैसे पहले इस पुरुष प्रधान देश में दहेज को बहुत एहमियत दी जाती थी, जैसा कि आज भी बहुत जगह दी जाती है। और कोई ज्यादा दहेज ना दे पाए तो बेटी को तरह तरह की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ी थी। आज भी इसकी संख्या कम नहीं। परन्तु आज हमारे समाज को सिर्फ इस पहलू से नहीं लड़ना।
नई तकनीकी के साथ साथ नई अड़चने भी आती है। ऐसे ही दहेज के कानून के साथ साथ दुरूयोग भी आगया। और ये हमारे लिए शर्म की बात है, जी जितना हम सशक्तिकरण की बात करते है, कुछ महिलाएं दुरुपयोग की दौड़ में लग गई है। पति से ना बनना, ससुराल वालों से ना बनना, अपनी बातें मनवाना आम सी बात है आजकल हर दूसरे घर में। परन्तु इन सब के लिए कानूनों का दुरूयोग बड़े जोरों से होने लगा है।
आज कल बहुत सारी महिलाएं पैसे के लिए भी कानून का दुरूयोग कर रही है। अपने पति, ससुराल वालों की नाक में दम करके, उनसे मार पिटाई करके, खुद को मारने की धमकी देकर, दहेज के कानून के हवाले अपने ही लोगों को परेशान कर रही है।
हम समझते है, समाज में दहेज की वजह से बहुत सारे मा बाप ने अपनी लाडो को खोया, भाईयो की कलाइयां सुनी हो गई, बहन की सखी चली गई। समाज में कुप्रथाओं की कमी नहीं है, और दिन पर दिन कुछ नए अपराध सामने आरहे है। सबके लिए कानून बनाने जरूरी है चाहे वो बच्चे हो, चाहे वो महिलाएं हो या हमारे समाज के पुरुष ही क्यूं ना हो।
हमे समानता के अधिकार के लिए काम करना चाहिए। हमारे समाज में जिस दिन एक इंसान दूसरे इंसान को समान समझेगे उस दिन शायद हम कुछ अपराधों को कम कर पाए। यह सिर्फ महिलाओं के सशक्तीकरण के बात नहीं है, ये हमारे समाज को देश को अपराध मुक्त करने की पहल होगी।
इसलिए क्यूं ना  महिला अधिकार की नहीं अपितु समानता के अधिकार की बात करे। अपने लिए अपनों के लिए ।
Contributed by: Ravi Tondak

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