निर्भाया: एक साल बाद

A Part of the 16 Meters Painting on Display: NIRBHAYA

निर्भाया या दामिनी| एक साल बीत गया, पर बीता ना वो दर्द, वो साँसों की खामोशी और ना बीता वो दिल का करहाना|

 
सबकी माने तो निर्भाया सबमे वो जज़्बा पैदा कर गयी जिसकी ज़रूरत थी, देश को एकजुट कर गयी, इंसाफ़ के लिए लड़ने के लिए| परंतु क्या ये सच है या सिर्फ़ हमारा वह्म| हम अगर आज भी एक साल को पलटकर देखें तो क्या हम पाएगे की हमारे समाज में आत्याचार नही हुए, या सड़को, गाड़ियों या घरों में बलात्कार नहीं हुए? एक साल के आकड़े निकाल कर देखे हमारी टीम www.crimeindelhi.com ने, पर निराशा ही हाथ लगी|
 
सिटिज़न आर्टिस्ट ग्रूप के साथ मिलकर एक संघर्ष और www.crimeindelhi.com ने जंतर मंतर पर[highlight] निर्भाया: विमन विदाउट फियर[/highlight], एक कार्यकर्म आयोजित किया| बहुत लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया| लोगो ने अपने रोष को अपने शब्दों, अपने गीतों और कविताओं द्वारा प्रस्तुत किया और सिग्नेचर कॅंपेन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया| इसी तरह के कार्यकर्म जंतर मंतर और पूरी दिल्ली या कहें पूरे भारत में नारेबाज़ियों के साथ हुए|
 
कार्यकर्म मे आए लोगों के विचार सुने| कविता कृष्णन, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमन’स असोसियेशन, की सुने तो हमें सेफ्टी टिप्स की ज़रूरत ही नही है| हमें ये सब नही चाईए| जज़्बा चाईए विरोध करने का| द्वारका के पी बी मिश्रा जी की कविता ने तो दिल का दर्द आज भी पहचान लिया| जो कभी ना कभी हमारे दिल में कसक कर ही देता है| लोगों की राय अलग अलग थी परंतु सबसे सही बात लगी प्रतिभा सरोया जी की अगर उमर से बड़ा क्राइम है तो अपराधी को सज़ा देते हुए उम्र क्यों देखी जाती है! हम सबको इसके लिए ज़रूर अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी| हमारे देश के क़ानून ने इंसाफ़ किया की दरिंदों को फासी की सज़ा दी प्रन्तु क्या ये अन्याय नहीं है की जिन लोगों ने ये अपराध किया उनमें से एक अभी भी नाबालिक होने के कारण बचा हुआ है क़ानून के शिकेंज़े से| जब लोग क्राइम करते हुए नहीं सोचते की उनकी उमर क्या है तो ये कौन सा न्याय है की उसको सज़ा इसलिए नहीं मिल सकती क्योकि उसकी उम्र कम है| हमें इसके लिए मुहिम शुरू करनी होगी और इसे आगे तक ले कर जाना होगा| 
 
वैसे भी आँकड़े देखकर हमें बिल्कुल नही लगता की अपराध मे कुछ कमी आई बल्कि 30% सेक्स क्राइम बढ़ गया है| निर्भाया फंड मंज़ूर हुआ था, निर्भाया दिवस मनाया जा रहा है परंतु क्या सिर्फ़ कॅंडल जलाने से, भाषणों  में दर्द व्यक्त करने से या इश्यू डिसकस करने से क्या हमारा समाज सेक्स क्राइम या क्राइम अगेन्स्ट विमन से निकल पाएगा? हम ये नहीं कहते की सब एक जैसे होते है, परंतु क्या है ये और क्यों है ये? हमारे अपने दोस्त, साथी, रिश्तेदार और अंजान लोग कैसे हमारे उप्पर फिज़िकली कंट्रोल करके हमारे साथ कुछ भी कर सकते हैं? हम सिर्फ़ ये कहना चाहते हैं की आज हमें 10-12 साल पुराने दोस्तों से मिलते हुए डरना चाईए क्या??? हम जितना मर्ज़ी पढ़ लिख लें, होशियार हो जाएँ, क्या हम इन चीज़ो पर कंट्रोल कर सकते हैं? आख़िर एक बेबस लड़की क्या करे? स्टडी, सेल्फ़ डिफेन्स या फिर हमेशा ताले में बंद रहे?
 
एक लड़की|

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7 thoughts on “निर्भाया: एक साल बाद

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