भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार | Women Rights in India – CrimeInDelhi

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

महिलाएं हमारे देश का गौरव है और भारत में महिलाओ को देवी का दर्ज़ा दिया गया है. परन्तु, जहां अच्छाई है वह बुराई भी है. इसी वजह से महिलाओ को अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी पड़ता है. आजकल सब ज्यादा ट्रिपल तलाक की खबर आ रही है. बिल पास करने के लिए पापड़ बेले जा रहे है. इसलिए एक बार महिलाओ के अधिकारों पर एक बार नज़र डालते है जो उन्हें कानूनी रूप से मिले है.

लीगल सर्विस अथॉरिटी एक्ट 1987

लीगल सर्विस अथॉरिटी एक्ट 1987 के हिसाब से अगर कोई बलात्कार के पीड़ित महिला हो और वो केस लड़ने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम ना हो तो उससे अधिकार मिला हुआ है की उसे निशुल्क वकील सरकार द्वारा कराया जाता है.

ऐसे मामलो की सुनवाई महिला जज ही करती है. और इन मामलो की सुनवाई 2 महीनो में पूरी करने के प्रयास होते है.

बलात्कार के मामले में पीड़िता के बयान महिला पुलिस अधिकारी दर्ज करेगी. पीड़िता का बयान उसके घर के उसके परिजनों के सामने ही लिखा जाना चाहिए.

यौन शोषण की शिकायत कभी भी

यदि कोई महिला किसी वजह से या डर से समय पर यौन शोषण की शिकायत नहीं कर पाती और बाद में करती है तो उसको ये अधिकार है की पुलिस उसकी शिकायत दर्ज करे. कोई भी पुलिस कर्मी उसको देरी की वजह से माना नहीं कर सकता.

गोपनीयता का अधिकार

किसी भी पीड़िता के यौन शोषण का शिकार होने पर उसके अपनी गोपनीयता रखने का पूरा अधिकार है. इसलिय किसी भी चैनल या न्यूज़ में पीड़ित महिला की पहचान सार्वजानिक करने का अधिकार नहीं है. अगर वो ऐसा करते है तो ऐसा करना कानूनन जुर्म है.

बयान देने के लिए कानून

अगर किसी महिला का पुलिस स्टेशन में बयान लिया जाता है तो उस समय महिला पुलिस कांस्टेबल का होना अनिवार्य है. अगर ऐसा नहीं हो तो महिला अपने बयान देने से माना कर सकती है.

किसी भी महिला को जरुरी नहीं की अपना बयान देने पुलिस स्टेशन ही जाना पड़े. महिला, अपने राइट्स के तौर पर किसी भी महिला पुलिस अधिकारी की मांग कर सकती है और अपना बयान घर से ही दे सकती है. परन्तु पुलिस सीधा घर जाकर बयान नहीं ले सकती, वह अवैध माना जाता है.

अगर कोई महिला शारीरिक रूप से पुलिस स्टेशन आने में सक्षम नहीं और उसको एफ आई आर, तो वह अपनी शिकायत ईमेल या पत्र द्वारा भेज सकती है. सही डिपार्टमेंट और स्टेशन में शिकायत आने के बाद, पुलिस खुद महिला के आवास पर जाकर उसकी छानबीन करती है.

गिरफ्तारी सम्बंधित कानून

भारत के कानूनों के हिसाब से किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्यौदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. और अगर किसी महिला पर किसी संगीन अपराध साबित हो तब भी मजिस्ट्रेट की विशेष अनुमति से ही महिला को गिरफ्तार किया जा सकता है.

जीरो एफ आई आर रूल

जीरो एफ आई आर के तहत, कोई भी महिला किसी भी पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है. और पुलिस इसके तहत एफ आई आर दर्ज करने से माना नहीं कर सकती. यदि ऐसा हो तो आप उस पुलिस स्टेशन के खिलाफ भी दूसरे पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कर सकते है.

लिव – इन रिलेशनशिप में अधिकार

लिव – इन रिलेशनशिप में भारत के संविधान के हिसाब से एक महिला को वही दर्जा मिलता है, जो एक विवाहिता को भारत में मिलता है. लिव – इन रिलेशनशिप से पैदा हुई संतान वैद्य मानी जाएगी और उसे सारे पैतृक हक़ भी मिलते है और सम्पति में भी हिस्से का अधिकार होता है.

गर्भपात करना अपराध

भारतीय कानून के अनुसार, गर्भपात करना कानूनन अपराध है. परन्तु अगर किसी वजह से गर्भ की वजह से महिला की जान को खतरा हो तो ऐसी स्थिति में गर्भपात कराया जा सकता है.

स्कूल में दाखिले में माँ के नाम

अगर आप अकेली माँ है, यानि की सिंगल मदर है, तो दाखिले के वक़्त पिता का नाम लिखवाना अब अनिवार्य नहीं है. बच्चे के लिए माँ या पिता में से किसी भी एक काम नाम लिखना पर्याप्त होता है.

नाबालिग विवाह मान्य नहीं

यदि कोई माता पिता किसी नाबालिग बेटी या बेटे की शादी करा दे, तो वो विवाह मान्य नहीं होता. और इस तरह के लड़का / लड़की बालिग़ होने पर दोबारा शादी कर सकते है क्युकी हमारे संविधान में कानूनी तौर पर नाबालिग विवाह मान्य नहीं है.

सम्पति से जुड़ा महिला का अधिकार

हिन्दू उत्तराधिकार कानून संशोधन 2005 के अनुसार, जितना हक़ पिता की सम्पति/ पैतृक सम्पति पर पुत्र का होता है, वही बराबर का हक़ पुत्री का भी होता है. अगर स्वयं पिता या भाई / बहन किसी वजह से सम्पति ना दे या आना कानी करे तो लड़की कानूनी तौर पर अपने हक़ का दावा कर सकती है.

तनख्वाह / भत्ते के अधिकार

इक्कुअल रमुनेरशन एक्ट 1976 के तहत, अगर कोई महिला किसी भी ऑफिस/कंपनी में कार्यरत है तो उसको उसी पद के हिसाब से एक पुरुष के बराबर ही वेतन मिलने का अधिकार है. अगर ऐसा नहीं होता तो महिला, अपने अधिकार के लिए कानून का सहारा ले सकती है.

मातृत्व लाभ अधिनियम,1961

कोई भी कंपनी/ऑफिस किसी महिला कर्मचारी को गर्भवती होने पर नौकरी से नहीं निकाल सकती. किसी भी कारण से महिला को अपने रोजगार से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है।

कोई भी महिला मैटरनिटी बेनिफिट (अमेंडमेंट) एक्ट, 2017 के अनुसार, चाहे वो सरकारी दफ्तर में हो या किसी प्राइवेट नौकरी में, वह गर्भावस्था के दौरान, 12 से 26 हफ्ते के छुट्टी ले सकती है.

और अगर कोई बच्चा गोद ले रही है तो भी कम से कम, एडॉप्शन के दिन से १२ हफ्ते की छुट्टी ले सकती है.

दहेज़ कानून के तहत

महिलाओ पर दहेज़ के नाम से बड़े उत्पीड़न होते है. भारत के कानून के तहत, दहेज़ लेना और दहेज़ देना दोनों ही अपराध की श्रेणी में आते है. शादी के बाद कोई भी महिला दहेज़ के खिलाफ, अपनी शिकायत दर्ज कर सकती है, जिसकी वजह से उसके पति और ससुराल वालो को कड़ी सजा का प्रावधान है.

लिंग जांच की शिकायत

प्रसव से पूर्व लिंग का जांच करना कानूनन अपराध है. अगर किसी का पति और ससुरालवाले लिंग जांच पर दबाव डाले तो महिला आपकी शिकायत कर सकती है. लिंग की जांच करने वाले डॉक्टर और परिवार वालो पर सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

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